मोराटोरियम: RBI का हलफनामा मीडिया में आने पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी, कही ये बात
प्रभाकर मिश्रा, नई दिल्ली: मोराटोरियम अवधि के दौरान ब्याज माफी को लेकर RBI का हलफनामा मीडिया में आ जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है। कोर्ट ने RBI पर नाराजगी जताते हुए कहा कि ‘कोर्ट में जवाब दाखिल करने से पहले RBI मीडिया में जवाब दाखिल करता है क्या? कोर्ट ने RBI के वकील को चेतावनी देते हुए कहा कि आगे से ऐसा नहीं होना चाहिये।
सुप्रीम कोर्ट ने मोराटोरियम अवधि के दौरान ब्याज माफी की मांग वाली याचिका पर रिज़र्व बैंक से जवाब मांगा था। बुधवार को RBI ने सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में मोराटोरियम अवधि के दौरान ईएमआई पर ब्याज माफी की मांग का विरोध किया है।
RBI ने कहा है कि लोगों को 6 महीने का EMI अभी न देकर बाद में देने की छूट दी गई है, लेकिन इस अवधि का ब्याज भी नहीं लिया गया तो बैंकों को 2 लाख करोड़ रु का नुकसान होगा। जिससे बैकों के वित्तीय स्थिति खराब हो सकती है। RBI के हलफनामे की बात कल ही मीडिया में सार्वजनिक हो गयी थीं। सुप्रीम कोर्ट 12 जून को RBI के जवाब पर सुनवाई करेगा।
गौरतलब है कि RBI ने 27 मार्च को एक सर्कुलर जारी कर तीन महीने के लिए लोन की ईएमआई देने से छूट (मोराटोरियम) का एलान किया था। 22 मई को RBI ने इस मोराटोरियम अवधि को 6 महीने के लिए बढ़ा दिया है। सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका में मोरेटोरियम अवधि के दौरान की ईएमआई पर ब्याज माफी की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि लॉकडाउन के दौरान बैंकों ने किश्त अदायगी में छूट तो दी गयी है, जो कि बाद में चुकानी पड़ेगी, लेकिन किश्तों को बाद में जम्म करने की छूट देने के नाम पर बैंक अपने ग्राहकों से किश्त बाद में अदा करने तक की अवधि पर चक्रवर्ती ब्याज वसूल रहे हैं जिससे ग्राहक पर और आर्थिक बोझ पड़ेगा।
याचिका में यह भी कहा गया है कि लॉकडाउन के दौरान जब कामकाज बंद पड़ा है, इस अवधि में लोन पर बैंक के ब्याज को माफ किये जाने चाहिए। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि कोर्ट, केंद्र सरकार और आरबीआई को यह व्यवस्था देने का निर्देश दे कि कोई भी बैंक या वित्तीय संस्था मोराटोरियम की अवधि का किसी तरह का ब्याज न ले।
जनहित याचिका में कहा गया था कि लॉकडाउन के चलते जब लोगों की नौकरियों पर संकट हो और उनसे आय का साधन छीन लिया गया हो तो सरकार और बैंकों को मानवीय नजरिया अपनाना चाहिए।याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि नियमित ईएमआई के साथ अतिरिक्त ब्याज का भुगतान करने का कोई अर्थ नहीं है, इसलिए राज्य का कर्तव्य है कि संकट के इस समय में उधारकर्ताओं को छूट दी जाए।
याचिका में कहा भी कहा गया था कि लॉकडाउन के चलते लोग बेहद परेशानी के दौर से गुजर रहे हैं। जब पूरा देश स्वास्थ्य आपातकाल से प्रभावित है, वित्तीय संस्थानों को लाभ अर्जित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। इसलिए अदालत उचित आदेश जारी करे कि सार्वजनिक हित में बैंक और वित्तीय संस्थान कम से कम मोरेटोरियम पीरियड के लिए अपने ग्राहकों से अतिरिक्त ब्याज नहीं वसूलें।
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